ठेकेदारों पर चला योगी का हंटर, अब नहीं कर सकेंगे घटिया निर्माण, जमा करनी होगी भारी भरकम सिक्योरिटी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकारी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर अक्सर उठने वाले सवालों और टेंडर प्रक्रिया में होने वाले अंडरकटिंग के खेल को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब एक सख्त कदम उठा लिया है। सोमवार को लोकभवन में हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार ने निर्माण क्षेत्र से जुड़े ठेकेदारों और कार्यदायी संस्थाओं के लिए नए और सख्त नियमों को मंजूरी दे दी है। अब उन ठेकेदारों की खैर नहीं होगी, जो टेंडर पाने के लिए सरकारी अनुमानित लागत से बहुत कम रेट डाल देते थे और बाद में बजट की कमी का रोना रोकर घटिया सामग्री का इस्तेमाल करते थे।

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निर्माण जगत में हलचल

योगी सरकार का यह फैसला न केवल प्रदेश के बुनियादी ढांचे को मजबूती प्रदान करेगा, बल्कि भ्रष्टाचार की उन जड़ों पर भी चोट करेगा जहां कागजों पर काम दिखाकर जनता की गाढ़ी कमाई का बंदरबांट किया जाता था। इस नए नियम के लागू होने के बाद अब ठेकेदारों को काम शुरू करने से पहले ही अपनी जेब ढीली करनी होगी और एक भारी-भरकम अतिरिक्त परफार्मेंस सिक्योरिटी सरकारी खजाने में जमा करानी होगी।

Yogi

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश में सड़कों, पुलों, सरकारी इमारतों और अन्य बुनियादी ढांचों के निर्माण में पारदर्शिता और मजबूती सुनिश्चित करने के लिए जो फैसला लिया है, वह निर्माण जगत में एक बड़ी हलचल पैदा करने वाला है। कैबिनेट बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार, अब यदि कोई ठेकेदार सरकार द्वारा तय की गई अनुमानित लागत से 15 प्रतिशत या उससे भी कम दर पर टेंडर डालता है, तो उसे सरकार के पास अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करनी पड़ेगी।

यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया था कि, टेंडर प्रक्रिया के दौरान ठेकेदार काम पाने की होड़ में लागत से काफी कम रेट भर देते थे। जब उन्हें काम मिल जाता था, तो वे कम बजट का बहाना बनाकर निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करते थे। इससे सड़कें कुछ ही महीनों में टूटने लगती थीं और सरकारी भवनों में दरारें आने की शिकायतें आम हो गई थीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस समस्या की जड़ पर प्रहार करते हुए साफ कर दिया है कि, अब केवल टेंडर लेना ही काफी नहीं होगा, बल्कि काम की गुणवत्ता भी विश्वस्तरीय होनी चाहिए।

सरकार के पास ब्लाक रहेगी पूंजी

इस नए नियम के गणित को समझें, तो यह ठेकेदारों के लिए किसी कड़ी सजा से कम नहीं है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि, यदि कोई निविदादाता विभाग द्वारा तय लागत से 15 से 20 प्रतिशत तक कम रेट पर काम मांगता है, तो उसे लागत के अंतर की 100 प्रतिशत धनराशि अतिरिक्त सिक्योरिटी के तौर पर जमा करनी होगी। वहीं, यदि कोई ठेकेदार 20 प्रतिशत से भी अधिक कम रेट कोट करता है, तो उसे अनुमानित लागत और उसकी अपनी निविदा दर के अंतर का 150 प्रतिशत अतिरिक्त परफार्मेंस सिक्योरिटी के रूप में देना होगा।

उदाहरण के लिए, यदि किसी पुल के निर्माण की सरकारी लागत 100 रुपये तय की गई है और कोई ठेकेदार उसे मात्र 80 रुपये में बनाने का प्रस्ताव देता है, तो उसे बचे हुए 20 रुपये का 100 से 150 प्रतिशत तक हिस्सा एडवांस सिक्योरिटी के रूप में जमा करना होगा। यह राशि तब तक सरकार के पास रहेगी जब तक काम पूरा नहीं हो जाता और उसकी गुणवत्ता की जांच नहीं हो जाती। इस भारी-भरकम धनराशि के प्रावधान से अब ठेकेदार अनाप-शनाप कम रेट डालने से डरेंगे, क्योंकि उन्हें पता होगा कि, उनकी एक बड़ी पूंजी सरकार के पास ब्लॉक हो जाएगी।

जांची जाएगी निर्माण की गुणवत्ता

सरकार का यह निर्णय केवल नए टेंडर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन ठेकेदारों की भी घेराबंदी की गई है जिनका ट्रैक रिकॉर्ड संदिग्ध रहा है। कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, जिन ठेकेदारों ने बहुत कम दरों पर पहले से काम ले रखे हैं, उनके वर्तमान कार्यों की सघन गुणवत्ता जांच कराई जाएगी। इतना ही नहीं, यदि कोई ऐसा ठेकेदार टेंडर प्रक्रिया में शामिल होता है जिसका पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश में कोई निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है या वर्तमान में कोई काम नहीं चल रहा है, तो उससे भी अतिरिक्त परफार्मेंस सिक्योरिटी वसूली जाएगी।

यह नियम उन फ्लाई-बाय-नाइट ऑपरेटरों और बाहरी फर्मों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया है, जो केवल कागजों पर तकनीकी बिड पूरी करके काम ले लेते थे और बाद में उसे अधूरा छोड़ देते थे या स्थानीय ठेकेदारों को पेटी कॉन्ट्रैक्ट पर देकर काम की गुणवत्ता बिगाड़ देते थे। अब हर ठेकेदार को अपनी तकनीकी और वित्तीय क्षमता का प्रमाण इस सिक्योरिटी राशि के जरिए देना होगा।

उल्लेखनीय है कि, उत्तर प्रदेश में अब तक परफार्मेंस सिक्योरिटी का जो नियम लागू था, वह काफी लचीला था। वर्तमान में 40 लाख रुपये तक के छोटे कार्यों पर केवल 10 प्रतिशत और इससे अधिक की बड़ी परियोजनाओं पर मात्र 5 प्रतिशत परफार्मेंस सिक्योरिटी जमा करनी होती थी। यह राशि इतनी कम थी कि, ठेकेदारों को लागत से 30-40 प्रतिशत नीचे जाकर टेंडर डालने में कोई आर्थिक जोखिम नहीं महसूस होता था।

सख्त होगी निर्माण कार्यों की ऑडिटिंग 

वे कम रेट पर काम लेकर बाद में घटिया ईंट, बालू और सीमेंट का उपयोग करके अपना मुनाफा निकाल लेते थे, लेकिन अब योगी कैबिनेट के इस क्रांतिकारी फैसले से लोएस्ट बिडर (L1) बनने की अंधी दौड़ पर लगाम लगेगी। लोक निर्माण विभाग (PWD), सिंचाई विभाग, आवास विकास और सेतु निगम जैसे महत्वपूर्ण विभागों में अब केवल वही कंपनियां टिक पाएंगी, जिनके पास बेहतर संसाधन और ईमानदारी से काम करने की नीयत होगी।

Yogi

इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार अब निर्माण कार्यों की ऑडिटिंग को लेकर भी सख्त हो गई है। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि कम दरों पर काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा पूर्व में कराए गए निर्माण कार्यों का भी रैंडम निरीक्षण किया जाए। यदि जांच में कोई कमी पाई जाती है, तो उनकी जमा सिक्योरिटी राशि जब्त कर ली जाएगी और उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा सकती है। इससे विभाग के उन अधिकारियों पर भी दबाव बढ़ेगा जो ठेकेदारों से साठगांठ करके घटिया निर्माण को पास कर देते थे।

अब जब सिक्योरिटी की राशि इतनी अधिक होगी, तो विभागीय इंजीनियरों के लिए भी किसी गलत काम को सही ठहराना मुश्किल होगा। सरकार का मानना है कि इस नीति से प्रदेश के राजस्व की बचत होगी, क्योंकि बार-बार मरम्मत पर होने वाला खर्च बचेगा और एक बार बनी सड़क या भवन अपनी तय सीमा तक सुरक्षित रहेंगे।

छोटे ठेकेदारों के लिए मुश्किल

योगी सरकार के इस फैसले का असर प्रदेश के हजारों ठेकेदारों पर पड़ने वाला है। हालांकि, कुछ बड़े ठेकेदारों और एसोसिएशनों का तर्क है कि इससे छोटे ठेकेदारों के लिए बाजार में टिकना मुश्किल हो जाएगा और पूंजी का अभाव उनके काम में बाधा बनेगा। लेकिन सरकार की दलील स्पष्ट है कि गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां लाखों करोड़ की बुनियादी ढांचा परियोजनाएं चल रही हैं, वहां निर्माण की स्थिरता और सुरक्षा सर्वोपरि है। सरकार का यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीरो टॉलरेंस टू करप्शन के विजन को धरातल पर उतारने जैसा है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के सड़कों की सूरत और सरकारी भवनों की मजबूती इस फैसले की सफलता की गवाही देगी।

फिलहाल, कैबिनेट की इस मुहर ने निर्माण माफियाओं और लापरवाह ठेकेदारों की नींद उड़ा दी है और विभाग को एक नया हथियार थमा दिया है जिससे वे विकास कार्यों को पारदर्शी और टिकाऊ बना सकेंगे।

 

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