
पश्चिम बंगाल। भारत के राजनीति के इतिहास में 4 मई की तारीख एक बड़े सियासी टर्निंग पॉइंट के रूप में दर्ज होने के आसार हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों के जो रुझान सुबह से सामने आ रहे हैं, उन्होंने न केवल एग्जिट पोल्स को झुठला दिया है, बल्कि देश के राजनीतिक भूगोल को भी पूरी तरह से पुनर्गठित कर दिया है।
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हाशिये पर दिग्गज
इसे महज एक चुनाव परिणाम कहना गलत होगा, क्योंकि यह दशकों से जमी-जमाई क्षेत्रीय शक्तियों के ढहने और नई विचारधाराओं के उदय की गाथा है, जहां एक ओर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अभेद्य किला भाजपा के हिंदुत्व और विकास के चक्रव्यूह में फंसकर ढहता नजर आ रहा है, वहीं तमिलनाडु की धरती पर सुपरस्टार विजय ने अपनी नई पार्टी टीवीके के साथ वह करिश्मा कर दिखाया है जिसकी कल्पना एम.के. स्टालिन की डीएमके ने कभी सपने में भी नहीं की थी। पूर्व से लेकर दक्षिण तक, सत्ता विरोधी लहर ने उन दिग्गजों को हाशिए पर धकेल दिया है जो खुद को अजेय मानते थे।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए इस महा-भूकंप ने राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से आगे निकल जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बंगाल की जनता ने इस बार ‘परिवर्तन’ के नारे को पूरी गंभीरता से आत्मसात किया है। सुबह 11 बजे तक के रुझानों ने यह साफ कर दिया कि भाजपा बंगाल में केवल एक विपक्षी दल के रूप में नहीं, बल्कि एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के रूप में उभर रही है।
टीएमसी में ख़ामोशी
सुवेंदु अधिकारी के वे तीखे शब्द कि उनको रोने दीजिए, अब सब खत्म हो गया है, टीएमसी के खेमे में छाई खामोशी की गवाही दे रहे हैं। भाजपा के लिए यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि उसने ममता बनर्जी के उस मातृत्व और माटी वाले नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया है जिसके दम पर उन्होंने पिछले तीन चुनाव जीते थे। भाजपा नेताओं का मानना है कि इस बार हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनाक्रोश ने टीएमसी की जड़ों को खोखला कर दिया।
वहीं, दक्षिण भारत के द्वार तमिलनाडु में एक नया इतिहास रचा जा रहा है। अब तक तमिलनाडु की राजनीति केवल दो ध्रुवों डीएमके और एआईएडीएमके के इर्द-बिर्द घूमती थी, लेकिन अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) ने इस द्विध्रुवीय राजनीति को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। रुझान बताते हैं कि विजय ने न केवल युवाओं के वोट हासिल किए हैं, बल्कि वे राज्य में दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं।
हालांकि, एआईएडीएमके ने भाजपा के साथ मिलकर उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन असली चर्चा विजय के उस साइलेंट रिवोल्यूशन की है जिसने स्टालिन के द्रविड़ मॉडल को कड़ी चुनौती दी है। कोयंबटूर से लेकर नागरकोइल तक की सीटों पर जिस तरह के कांटे की टक्कर देखी जा रही है, वह बताता है कि तमिलनाडु का मतदाता अब पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से आगे निकलकर एक नया विकल्प तलाश रहा है।
भाजपा के लिए संजीवनी है रुझान
असम और पुडुचेरी के रुझान भाजपा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं। असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का जादू एक बार फिर सर चढ़कर बोल रहा है। 126 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा गठबंधन न केवल दोबारा सरकार बनाता दिख रहा है, बल्कि उसकी सीटों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है। यह परिणाम सिद्ध करता है कि पूर्वी भारत में भाजपा अब एक स्थाई और अजेय शक्ति बन चुकी है।
उधर, पुडुचेरी में भी एनडीए गठबंधन सत्ता को बरकरार रखने में सफल होता दिख रहा है। इन राज्यों के नतीजे भाजपा आलाकमान को यह भरोसा दिलाने के लिए काफी हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव की कसक अब 2026 के इन विधानसभा चुनावों ने पूरी तरह मिटा दी है। भाजपा के एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता ने मुस्कुराते हुए इसे जनता का मीठा बदला करार दिया, जो दर्शाता है कि पार्टी इन नतीजों को अपनी राष्ट्रीय स्वीकार्यता की मुहर के रूप में देख रही है।
हालांकि, केरल की तस्वीर थोड़ी अलग है। वहां बदलाव की जो लहर चली है, उसने वामपंथी सरकार के पांव उखाड़ दिए हैं और कांग्रेस नीत यूडीएफ को बढ़त दिलाई है, लेकिन तमिलनाडु में भाजपा की अपनी स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, जहां उसके बड़े उम्मीदवार फिलहाल पीछे चल रहे हैं। इसके बावजूद, भाजपा के लिए बंगाल की जीत इन तमाम छोटी हारों पर भारी पड़ती दिख रही है।
काउंटिंग हाईजैक करने का आरोप
बंगाल में जिस तरह से सुवेंदु अधिकारी ने हिंदू ईवीएम बनाम मुस्लिम ईवीएम का नैरेटिव सेट किया, उसने मतों के गणित को पूरी तरह बदल दिया। उनका यह दावा कि मालदा और मुर्शिदाबाद को छोड़कर बाकी बंगाल भाजपा के साथ है, राज्य के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में आए बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। टीएमसी के द्वारा सीसीटीवी बंद होने और काउंटिंग हाईजैक करने के आरोपों को भाजपा ने हार की हताशा करार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, यदि ये रुझान अंतिम नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे कठिन दौर होगा। अमित शाह द्वारा निर्धारित 170 सीटों का लक्ष्य अब हकीकत के बेहद करीब नजर आ रहा है। बंगाल विभाजन के बाद पहली बार इस तरह की वैचारिक एकजुटता राज्य में देखी जा रही है। यह चुनाव परिणाम न केवल पांच राज्यों की सत्ता तय करेंगे, बल्कि 2029 के आगामी लोकसभा चुनाव की नींव भी रखेंगे।
विपक्ष के लिए यह दोहरा झटका है एक तरफ उनका सबसे मजबूत किला (बंगाल) ढह रहा है और दूसरी तरफ दक्षिण में एक नया प्रतिस्पर्धी (विजय) पैदा हो गया है जिसने कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के समीकरणों को बिगाड़ दिया है। आज के ये नतीजे भारतीय लोकतंत्र के एक नए अध्याय की प्रस्तावना लिख रहे हैं, जहां राष्ट्रवाद, क्षेत्रीय अस्मिता और नए चेहरों का एक दिलचस्प कॉकटेल देखने को मिल रहा है।
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