
वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया के आसमान में बारूद की गंध और गहरी होती जा रही है, क्योंकि ईरान के साथ बढ़ते सैन्य टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा दी हैं। ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियानों को और भी अधिक आक्रामक और मजबूत बनाने के लिए मिडिल ईस्ट में लगभग 3000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती का निर्णय लिया है।
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जल्द उड़ान भरेंगे पैराट्रूपर्स
यह कोई सामान्य तैनाती नहीं है बल्कि इसमें अमेरिका की सबसे घातक और फुर्तीली 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के कमांडो शामिल हैं। पेंटागन के सूत्रों का दावा है कि इस तैनाती के औपचारिक आदेशों पर जल्द ही हस्ताक्षर होने वाले हैं और अगले कुछ घंटों में ये जांबाज पैराट्रूपर्स रणक्षेत्र की ओर उड़ान भरेंगे।

पेंटागन और अमेरिकी सेंट्रल कमांड के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ आता है कि, अमेरिका ने इस क्षेत्र को एक अभेद्य सैन्य दुर्ग में तब्दील कर दिया है। वर्तमान में मिडिल ईस्ट के विभिन्न देशों और समुद्री सीमाओं में 50,000 से अधिक अमेरिकी सैन्यकर्मी पहले से तैनात हैं जिसमें केवल थल सेना ही नहीं बल्कि मरीन कॉर्प्स, अत्याधुनिक वायु सेना और नौसेना के विध्वंसक बेड़े शामिल हैं।
यह विशाल तैनाती दर्शाती है कि अमेरिका केवल रक्षात्मक नहीं बल्कि एक मल्टी-डोमेन युद्ध के लिए तैयार खड़ा है, जहां जमीन, आसमान और समंदर तीनों मोर्चों से ईरान की घेराबंदी की जा रही है। इस नई तैनाती का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के हजारों पैराट्रूपर्स का शामिल होना है जो इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स का हिस्सा हैं। सेना की यह इकाई दुनिया के किसी भी कोने में मात्र 18 घंटे के भीतर युद्ध के लिए पूरी तरह मुस्तैद होकर उतर सकती है और ये पैराट्रूपर्स आसमान से दुश्मन के इलाके में सीधे लैंडिंग करने और त्वरित हमले करने में माहिर माने जाते हैं।
मरीन कॉर्प्स ने संभाला मोर्चा
थल सेना की मजबूती के साथ-साथ अमेरिकी मरीन कॉर्प्स ने भी मोर्चा संभाल लिया है और दो मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट्स को सक्रिय किया गया है जिनमें लगभग 5000 मरीन और कुशल नाविक शामिल हैं। इनमें से करीब 2200 मरीन कमांडो पहले ही विशालकाय युद्धपोत यूएसएस त्रिपोली पर सवार होकर अपनी पोजीशन ले चुके हैं।
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि, आने वाले कुछ ही दिनों में 6000 से 7000 और सैनिकों की खेप मिडिल ईस्ट पहुंच सकती है, जिससे इस क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की कुल संख्या में बड़ा इजाफा होगा। अमेरिका की असली ताकत उसके समंदर में तैरते सैन्य अड्डों यानी एयरक्राफ्ट कैरियर्स में निहित है और पेंटागन ने यूएसएस गेराल्ड आर फोर्ड और यूएसएस जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर विमानवाहकों को खाड़ी देशों के करीब तैनात कर दिया है।
इन युद्धपोतों के साथ लगभग 200 अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों का बेड़ा तैनात है और हवाई अभियानों को लंबा खींचने के लिए दर्जनों ईंधन भरने वाले टैंकर विमान भी 24 घंटे उड़ान भर रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर अमेरिकी बमवर्षक ईरान के अंदरूनी हिस्सों तक सटीक हमला कर सकें। अमेरिकी सेना ने रणनीतिक रूप से खुद को कई देशों में फैलाया है ताकि ईरान को हर दिशा से घेरा जा सके।
सतर्क हुआ तेहरान
कतर का अल उदीद एयरबेस जो इस क्षेत्र में अमेरिकी वायु सेना का सबसे बड़ा मुख्यालय है वहां से लेकर बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई तक अमेरिकी ठिकाने अजेय बने हुए हैं। बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का स्थायी ठिकाना है जबकि अन्य देशों में मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे पैट्रियट और थाड तैनात किए गए हैं ताकि ईरानी मिसाइलों के किसी भी जवाबी हमले को हवा में ही ध्वस्त किया जा सके।

अमेरिका की इस भारी भरकम सैन्य लामबंदी ने तेहरान को पूरी तरह सतर्क कर दिया है और ईरान ने भी अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन रेजिमेंट को हाई अलर्ट पर रखा है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों और घातक हथियारों का जमावड़ा किसी बड़े सैन्य ऑपरेशन का संकेत हो सकता है। यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो मिडिल ईस्ट एक ऐसी आग की चपेट में आ सकता है जिसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
50,000 से ज्यादा अनुभवी जवानों की मौजूदगी और हजारों नए पैराट्रूपर्स की आमद के साथ अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अब कूटनीति के साथ-साथ सशस्त्र दबाव की नीति पर चल रहा है और अब दुनिया की नजरें ईरान के अगले कदम और वॉशिंगटन से जारी होने वाले अंतिम सैन्य आदेशों पर टिकी हैं।
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