सिल्वर स्क्रीन पर दिखेगी हरीश राणा की दास्तान, बेटे को बचाने की माता-पिता की जद्दोजहद और SC का ऐतिहासिक फैसला

 नई दिल्ली। नियति का क्रूर खेल और एक परिवार के असीमित धैर्य की ऐसी दास्तान शायद ही पहले कभी सुनी गई हो। पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर बेजान शरीर और कोमा की धुंधली दुनिया में कैद हरीश राणा को आखिरकार 24 मार्च को इस भौतिक पीड़ा से मुक्ति मिल गई। यह सिर्फ एक मृत्यु नहीं है, बल्कि एक ऐसे लंबे और हृदयविदारक अध्याय का अंत है जिसने भारतीय न्यायपालिका, चिकित्सा विज्ञान और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया था।

इसे भी पढ़ें- इच्छा मृत्यु से पहले हरीश राणा का भावुक संदेश, सबको किया माफ

सिनेमा के जरिए दुनिया तक पहुंचेगा संघर्ष

हरीश राणा की यह कहानी अब जल्द ही बड़े पर्दे पर एक फिल्म के रूप में अवतरित होने जा रही है, क्योंकि मुंबई के एक जाने-माने लेखक और फिल्मकार ने इस मार्मिक संघर्ष को सिनेमा के जरिए दुनिया तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। यह फिल्म केवल एक मरीज की तकलीफ की कहानी नहीं होगी, बल्कि यह एक मां के आंसुओं, एक पिता के लाचार संघर्ष, एक वकील की कानूनी जद्दोजहद और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय पर दिए गए ऐतिहासिक फैसले का एक जीवंत दस्तावेज साबित होगी।

HARISH

हरीश रा णा की कहानी की जड़ें हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के एक छोटे से शांत गांव प्लेटा से जुड़ी हुई हैं। बेहतर भविष्य और बच्चों की अच्छी शिक्षा के सुनहरे सपने लेकर उनके पिता वर्ष 1989 में दिल्ली आकर बस गए थे ताकि अपने परिवार को एक सुखद जीवन दे सकें। परिवार में सब कुछ बहुत ही सामान्य और खुशहाल चल रहा था। हरीश एक होनहार युवक के रूप में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

13 साल कोमा में रहे हरीश

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे ने इस परिवार की खुशियों पर हमेशा के लिए ग्रहण लगा दिया। इस हादसे के बाद हरीश गहरे कोमा में चले गए जहां से उनकी वापसी नामुमकिन हो गई। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के अथक प्रयास किए और परिवार ने अपनी पूरी जमा-पूंजी पानी की तरह बहा दी, लेकिन हरीश की चेतना वापस नहीं लौटी। वे न बोल सकते थे और न ही अपनी तकलीफ बयां कर सकते थे, वे केवल एक जीवित शव की तरह बिस्तर पर पड़े रहे और उनके माता-पिता ने 13 वर्षों तक हर दिन इस उम्मीद में बिताया कि, शायद उनका बेटा एक बार उन्हें पुकारेगा, लेकिन समय बीतने के साथ यह उम्मीद गहरे अवसाद और दर्द में बदलती गई।

करीब एक दशक से अधिक समय तक अपने जवान बेटे को तिल-तिल मरते और असहनीय पीड़ा झेलते देखना किसी भी माता-पिता के लिए नर्क से कम नहीं था। जब आधुनिक मेडिकल साइंस ने पूरी तरह हाथ खड़े कर दिए और सुधार की कोई भी गुंजाइश बाकी नहीं बची, तब भारी मन और कांपते हाथों से इस परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया जिसे लेना दुनिया के किसी भी माता-पिता के लिए सबसे कठिन कार्य होता है।

कोर्ट ने दिया इच्छामृत्यु का फैसला

उन्होंने अदालत से गुहार लगाई कि, उनके बेटे को इस नर्क जैसी जिंदगी से सम्मानजनक विदाई दी जाए जिसे कानूनी भाषा में इच्छामृत्यु कहा जाता है। हरीश के वकील मनीष जैन ने इस अत्यंत संवेदनशील मामले को देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचाया और यह कानूनी लड़ाई करीब तीन साल तक निरंतर चली।

यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया क्योंकि यह नैतिकता, कानून और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक बहुत बड़ा द्वंद्व था। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने हरीश की गंभीर स्थिति और परिवार के असहनीय दर्द को समझते हुए ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति प्रदान की जो भारतीय कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया। अब इस पूरे भावुक घटनाक्रम को फिल्म के रूप में ढालने की तैयारी पूरी तरह शुरू हो चुकी है।

हरीश के वकील से लेखक ने किया संपर्क

मिली जानकारी के अनुसार मुंबई के एक लेखक ने हरीश के वकील मनीष जैन से संपर्क कर इस केस की कानूनी बारीकियों और उन अनकहे भावनात्मक पहलुओं को समझने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जो अब तक दुनिया के सामने नहीं आए थे। फिल्म में मुख्य रूप से तीन बड़े पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा जिसमें हरीश के माता-पिता का 13 साल का निस्वार्थ समर्पण, वकील मनीष जैन की कानूनी मेहनत और न्यायपालिका की वह जटिल प्रक्रिया शामिल होगी जिसने एक इंसान को पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए इतना कड़ा फैसला लिया।

HARISH

इस कहानी का एक और सबसे प्रेरक पहलू अंगदान का फैसला है, क्योंकि हरीश के निधन के बाद उनके परिवार ने उनके अंगों को दान करने का जो निर्णय लिया वह इस कहानी को एक अत्यंत महान मोड़ देता है। फिल्म के जरिए समाज को यह बड़ा संदेश देने की कोशिश की जाएगी कि मौत के बाद भी कोई इंसान दूसरों के जीवन में रोशनी कैसे ला सकता है और सम्मानजनक विदाई का वास्तविक मानवीय अर्थ क्या होता है।

24 मार्च को हुआ हरीश का निधन

हरीश राणा का 24 मार्च को हुआ निधन सिर्फ एक परिवार की व्यक्तिगत क्षति नहीं है बल्कि यह आधुनिक समाज के लिए एक बड़ा आईना भी है जो हमें सिखाता है कि जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं है बल्कि गरिमा के साथ जीने का नाम है। 13 वर्षों तक कोमा के अंधेरे में रहने के बाद मिली यह मुक्ति एक ओर अत्यंत दुखदायी है तो दूसरी ओर यह एक तड़पती हुई आत्मा की शांति का एकमात्र मार्ग भी था।

फिल्म के निर्माण की खबर ने उन लोगों के बीच भी बहुत उत्सुकता पैदा कर दी है जो इच्छामृत्यु और स्वास्थ्य अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। यह फिल्म आने वाले समय में न केवल एक कलात्मक कृति होगी बल्कि समाज में गरिमा के साथ मरने के अधिकार जैसे गंभीर विषयों पर एक नई बहस और गहरी जागरूकता को जन्म देगी। हरीश राणा भले ही आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनका लंबा संघर्ष और उनके माता-पिता का महान त्याग अब सिल्वर स्क्रीन के जरिए इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर होने जा रहा है।

 

इसे भी पढ़ें- मौत नहीं, सम्मानजनक विदाई, SC ने गाजियाबाद के हरीश राणा के लिए सुनाया ऐतिहासिक फैसला

Related Articles

Back to top button