उत्तर प्रदेश में धरोहर स्थलों की जर्जर स्थिति पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का संज्ञान

अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण, पर्यटन मंत्रालय, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार तथा राज्य के पुरातत्व विभाग को नोटिस जारी किया है।

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश के विभिन्न ऐतिहासिक शहरों झांसी, वृंदावन, आगरा और लखनऊ में स्थित धरोहर स्थलों की जर्जर स्थिति पर गंभीर संज्ञान लिया है।अदालत ने संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण, पर्यटन मंत्रालय, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार तथा राज्य के पुरातत्व विभाग को नोटिस जारी किया है।

यह सुनवाई अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ द्वारा दायर जनहित याचिका पर हुई। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने 23 मार्च को दिए अपने आदेश में संबंधित विभागों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों को आठ सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रदेश के विभिन्न जिलों में कई अमूल्य धरोहर स्थल संबंधित अधिकारियों की उपेक्षा के कारण खंडहर में बदलते जा रहे हैं। याचिका में उल्लेख किया गया कि राज्य में लगभग 3500 पुरातात्विक धरोहर स्थल मौजूद हैं, जिनमें से केवल 212 का ही संरक्षण राज्य के पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।

इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज के अनुसार, पूरे राज्य में 5,416 धरोहर/ऐतिहासिक भवन हैं। इनमें से मात्र 412 स्थलों का संरक्षण किया जा रहा है। जिसमें 212 राज्य पुरातत्व विभाग, 154 एएसआई आगरा और 55 एएसआई लखनऊ द्वारा संरक्षित हैं।

याचिका में यह भी कहा गया कि शेष 4,995 धरोहर ढांचे जर्जर अवस्था में हैं और उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। साथ ही, प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत इन धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार दोनों की है।

इसके अतिरिक्त, आगरा क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण धरोहर स्थलों के लिए अब तक आवश्यक विरासत उपनियम नहीं बनाए गए हैं, जबकि कानून के अनुसार यह अनिवार्य है।

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