
नेपाल। नेपाल के हालिया संसदीय चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के नेतृत्व में बालेंद्र शाह (बालेन) की धमाकेदार जीत ने देश की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है। यह चुनाव पिछले साल सितंबर 2025 में हुए हिंसक जेन-जी आंदोलन के बाद पहला प्रमुख परीक्षण था, जिसने पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती दी और युवाओं की आवाज को मुख्यधारा में लाया। अब सवाल यह है कि क्या यह नई पीढ़ी के अरमान पूरे कर पाएगी या फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?
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जेन-जी आंदोलन से नया मोड़
दूसरी जनक्रांति का आधार नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता, भ्रष्टाचार और नेताओं के आपसी गठजोड़ों से जूझती रही है।2006 की पहली जनक्रांति के बाद 2008 में संविधान सभा के चुनाव हुए थे, जहां पुष्प कमल दाहल ‘प्रचंड’ की माओवादी पार्टी को भारी समर्थन मिला, लेकिन वे अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाए। 2015 में संविधान लागू होने के बावजूद राजनीतिक स्थिरता नहीं आई। कई प्रधानमंत्री बदले, गठबंधन बने-टूटे, लेकिन जनता की समस्याएं जस की तस रहीं।

सितंबर 2025 में जेन-जी आंदोलन ने नया मोड़ लिया। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों को दबाने के लिए 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे युवा सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनों में हिंसा हुई, दर्जनों मौतें हुईं और अंततः ओली सरकार गिर गई। इसे नेपाल की ‘दूसरी जनक्रांति’ कहा जा रहा है।
सोशल मीडिया, यूट्यूब और फेसबुक ने युवाओं को संगठित किया, एंटी-एस्टैब्लिशमेंट भावना को मजबूत किया। इस आंदोलन ने पारंपरिक दलों नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और माओवादी केंद्र के खिलाफ गुस्सा भड़काया। युवा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार मुक्ति की मांग कर रहे थे।
ऐतिहासिक जीत
बीते 5 मार्च 2026 को हुए संसदीय चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की। नेपाल की प्रतिनिधि सभा में 165 प्रत्यक्ष निर्वाचित सीटों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 117 से अधिक सीटें जीतीं और कई में आगे रही, जो कुल मिलाकर दो-तिहाई बहुमत की ओर इशारा करती है। यह नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे बड़ी भारी जीत में से एक है। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बालेंद्र शाह (बालेन) ने झापा-5 सीट पर चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को करारी शिकस्त दी। बालेन को 68,348 वोट मिले, जबकि ओली सिर्फ 18,734 पर सिमट गए, लगभग 50,000 वोटों का अंतर। यह नेपाल के संसदीय चुनाव इतिहास में सबसे बड़ा मार्जिन में से एक है।
दूसरी ओर, सीपीएन-यूएमएल (ओली की पार्टी) और नेपाली कांग्रेस काफी पीछे रही। सीपीएन-यूएमएल कुछ सीटों पर ही मजबूत दिखी, जबकि नेपाली कांग्रेस तीसरे स्थान पर। मधेसी दल भी प्रभावी नहीं रहे। प्रचंड जैसे पुराने नेता अपनी सीट बचाने में सफल रहे, लेकिन उनकी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा। बालेन, 35 वर्षीय पूर्व रैपर, सिविल इंजीनियर और काठमांडू के पूर्व मेयर, युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार विरोध, सुशासन और विकास के वादे किए। RSP मूल रूप से रवि लामिछाने की पार्टी है, लेकिन बालेन जैसे नए चेहरे शामिल होने से यह जेन-जेड की पार्टी बन गई।
बढ़ सकता है रोजगार का बोझ
यह जीत पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है। जेन-जी ने पुरानी राजनीति को अस्वीकार कर नई उम्मीद जगाई। बालेन का मधेसी मूल मधेश क्षेत्र के लिए नई संभावना है, जहां पहले उपेक्षा की शिकायत रही, लेकिन चुनौतियां बड़ी हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अधिकांश सांसद नए हैं, उनके पास प्रशासनिक अनुभव कम है। नौकरशाही, पुरानी राजनीतिक ताकतों और आर्थिक दबावों से निपटना होगा। चुनावी वादे जैसे रोजगार सृजन आसान नहीं। विदेश में माइग्रेशन बढ़ रहा है, खाड़ी देशों की अनिश्चितता से नेपाली वापस लौट सकते हैं, जिससे रोजगार का बोझ बढ़ेगा।
पार्टी के भीतर रवि लामिछाने पर पुराने भ्रष्टाचार आरोप हैं, जो विवाद पैदा कर सकते हैं। संविधान संशोधन, संघीयता और सनातन धर्म जैसे मुद्दे बहस छेड़ सकते हैं।
चीन की बढ़ती मौजूदगी बनेगी चुनौती
नेपाल-भारत के विशेष संबंध, सीमा और जल विवाद हैं। अगर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी विकास, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में भारत के साथ सहयोग बढ़ाए, तो स्थिरता आएगी। चीन की बढ़ती मौजूदगी भी चुनौती है।
2006 की क्रांति के बाद जनता को गणतंत्र, समानता और विकास मिला, लेकिन अवसरवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार ने निराश किया। अब RSP के पास मौका है कि वह अलग साबित हो। अगर बालेन सरकार जनता से जुड़ी रही, पारदर्शिता बरती और वादे पूरे किए, तो जेन-जी के अरमान पूरे हो सकते हैं। अन्यथा, यह एक और निराशा का अध्याय बन सकता है। नेपाल की राजनीति में यह बदलाव न सिर्फ आंतरिक, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रभाव डालेगा। युवा शक्ति की जीत एक संदेश है, पुरानी व्यवस्था अब नहीं चलेगी।
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