
वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र और धर्म-आस्था की नगरी काशी अब अपने पुरातन, दिव्य और भव्य स्वरूप के साथ-साथ एक नई पहचान की तरफ तेजी से आगे बढ़ रही है। अब इसकी पहचान हाईटेक शहर के रूप में होगी। शहर में अब आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर भीड़-भाड़ की समस्या को सुलझाने की तैयारी की जा रही है।
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एआई सेंसर, जेनरेटिव एआई, डिजिटल साइनेज, कलर कोडिंग और रियल-टाइम डेटा जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से अब काशी में भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट और सुव्यवस्थित होने वाली है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अब श्रद्धालुओं और पर्यटकों को संकरी गलियों और भीड़ में उलझने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वे मोबाइल ऐप और सड़कों पर बनी रंग-बिरंगी लाइनों के सहारे आसानी से बाबा विश्वनाथ मंदिर और गंगा घाट तक पहुंच सकेंगे।
टोयोटा मोबिलिटी फाउंडेशन के सहयोग से चल रहा है प्रोजेक्ट
यह पूरी परियोजना वाराणसी स्मार्ट सिटी और नगर निगम की एक महत्वाकांक्षी पहल है। इस काम के लिए टोयोटा मोबिलिटी फाउंडेशन की सस्टेनेबल सिटीज चैलेंज के अंतर्गत चार अलग-अलग कंपनियों को चुना गया है, जो अपने-अपने स्तर पर काशी को स्मार्ट बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। इनमें से एक कंपनी सिटीफ्लो बिग डेटा और जेनरेटिव एआई तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ऐसा सिस्टम तैयार कर रही है, जिसकी मदद से किसी भी इलाके में उमड़ने वाली भीड़ का अनुमान करीब चार घंटे पहले ही लगाया जा सकेगा।

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि, पुलिस और प्रशासन को समय रहते रियल-टाइम डेटा मिल जाएगा, जिसके आधार पर वे पहले से ही वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था कर सकेंगे और जरूरत पड़ने पर ट्रैफिक डाइवर्जन का इंतजाम भी कर पाएंगे। इससे न सिर्फ भीड़ को नियंत्रित करना आसान होगा, बल्कि किसी भी तरह की भगदड़ या अव्यवस्था की आशंका भी काफी हद तक कम हो जाएगी।
अब गलियां खुद बताएंगी रास्ता
काशी की तंग और घुमावदार गलियों में अक्सर श्रद्धालु रास्ता भटक जाते हैं, लेकिन अब यह समस्या भी जल्द ही दूर हो जाएगी। जनजात्रा नाम की कंपनी की योजना के तहत अब सड़कों और गलियों पर अलग-अलग रंगों की लाइनें बनाई जाएंगी, जो लोगों को रास्ता दिखाने का काम करेंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, श्रद्धालु पीले रंग की लाइन पर चलकरसीधे काशी विश्वनाथ मंदिर तक पहुंचेगे, जबकि नीले रंग की लाइन उन्हें गंगा घाट पहुंचाएगी। वहीं लाल रंग की लाइन का इस्तेमाल पिकअप पॉइंट या वापसी के रास्ते के तौर पर किया जाएगा।
सिर्फ रंगीन लाइनों तक ही यह योजना सीमित नहीं है। गलियों की दीवारों पर आकर्षक म्यूरल पेंटिंग भी बनाई जाएंगी, जिससे काशी की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलेगी। साथ ही डिजिटल साइन बोर्ड भी लगाए जाएंगे, ताकि किसी भी समय जानकारी की जरूरत पड़ने पर श्रद्धालुओं को दिक्कत न हो।
दिव्यांगों, बुजुर्गों और महिलाओं को मिलेगी खास सुविधा
इस पूरी परियोजना की एक और बड़ी खासियत यह है कि इसमें दिव्यांगों, बुजुर्गों और महिलाओं का खास ख्याल रखा गया है। प्रमेया कंसल्टिंग की तरफ से शुरू की गई नई चाल नाम की परियोजना खासतौर पर दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिकों और गर्भवती महिलाओं की सुविधा को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
इस योजना के तहत अस्सी घाट से लेकर मणिकर्णिका घाट तक इन सभी वर्गों के लोगों के आवागमन को आसान बनाने के लिए खास इंतजाम किए जाएंगे। रैंप, व्हीलचेयर, साफ-सुथरे शौचालय और चेंजिंग रूम जैसी बुनियादी सुविधाओं की पूरी जानकारी अब बेहतर-वे नाम के एक मोबाइल ऐप के जरिए भी उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि लोग घर बैठे ही अपनी यात्रा की पूरी योजना बना सकें और मौके पर जाकर उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
दो साल में पूरा होगा पूरा प्रोजेक्ट
इस पूरी परियोजना को लेकर नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया, यह पूरा प्रोजेक्ट रातों-रात तैयार नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे करीब दो साल की लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया रही है, तब जाकर चार कंपनियों का चयन किया गया, जो अब अपने-अपने पायलट प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने का काम कर रही हैं।

फिलहाल, इस योजना की शुरुआत गोदौलिया से दशाश्वमेध घाट तक के इलाके से की गई है, यानी सबसे पहले इसी क्षेत्र में यह नई व्यवस्था लागू होगी। इसके बाद इसे धीरे-धीरे पूरे काशी क्षेत्र में विस्तार दिया जाएगा, ताकि पूरा शहर ही इस स्मार्ट सिस्टम के दायरे में आ सके।
नगर आयुक्त नागपाल ने यह भी बताया कि, यह कोई ऐसी योजना नहीं है, जो सिर्फ कागजों पर बनाई गई हो। इसे तैयार करने के लिए ग्राउंड जीरो पर जाकर असली समस्याओं को समझा गया और उसी आधार पर व्यावहारिक समाधान खोजे गए। इस पूरी प्रक्रिया में इनोवेटर्स, जिला प्रशासन, मोबिलिटी विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन, सभी ने मिलकर काम किया है, ताकि योजना सिर्फ तकनीकी तौर पर ही नहीं बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी सफल साबित हो। नागपाल के मुताबिक, अगले दो साल के भीतर इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरी तरह से जमीन पर उतार दिया जाएगा।
श्रद्धालुओं की जुटी है भीड़
वाराणसी हर साल लाखों-करोड़ों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। खासकर सावन के महीने और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां भीड़ जुटती है। ऐसे में भीड़ प्रबंधन की यह नई और तकनीकी व्यवस्था न सिर्फ श्रद्धालुओं के अनुभव को बेहतर बनाएगी, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी यह एक बड़ा और जरूरी कदम साबित हो सकती है। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट पूरी तरह से धरातल पर उतरता है, तो आने वाले समय में काशी देश के अन्य धार्मिक और पर्यटन स्थलों के लिए भी एक मॉडल के तौर पर उभर सकती है, जहां परंपरा और तकनीक साथ-साथ चलती नजर आएंगी।
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