
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण देने से जुड़े प्रस्तावित प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसके लागू होने से पहले नई जनगणना कराना बेहद जरूरी है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी भी नीति की नींव सटीक और अद्यतन आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए।
यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्पस पर एक पोस्ट में कहा कि यदि महिला आरक्षण का आधार 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़े हैं, तो यह व्यवस्था स्वाभाविक रूप से त्रुटिपूर्ण होगी। उन्होंने कहा, “महिला आरक्षण बिल का आधार ही निराधार है। जब आरक्षण कुल सीटों के एक तिहाई पर आधारित है, तो यह गणित का विषय है और गणित का आधार सटीक संख्याएं होती हैं, न कि अनुमान।
सपा प्रमुख ने आगे कहा कि महिलाओं की जनसंख्या के लिए पुराने आंकड़ों का उपयोग करना नीति की बुनियाद को कमजोर करता है। जब भूमि में ही दोष होगा, तो सच्ची फसल कैसे उगेगी,उन्होंने कहा।अखिलेश यादव ने स्पष्ट रूप से मांग की कि पहले देश में नई जनगणना कराई जाए और उसके बाद ही महिला आरक्षण पर आगे बढ़ा जाए।
उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “जो सरकार महिलाओं को गिनना नहीं चाहती, वह उन्हें आरक्षण क्या देगी।” यादव ने आरोप लगाया कि महिलाओं के साथ छलावा किया जा रहा है और उनकी पार्टी इसे होने नहीं देगी। उन्होंने दोहराया, “जब तक जनगणना नहीं, तब तक महिला आरक्षण पर बहस नहीं।”
यह बयान नरेंद्र मोदी के उस हालिया बयान के एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि संसद का बजट सत्र तीन दिन के लिए बढ़ाया गया है, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले कानून को 2029 से लागू करने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके।
इससे पहले, संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कहा था कि सदन जल्द ही एक महत्वपूर्ण विधेयक पर विचार करने के लिए पुनः बैठक करेगा। उल्लेखनीय है कि 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है।
हालांकि, इस कानून के लागू होने को परिसीमन (डिलिमिटेशन) प्रक्रिया से जोड़ा गया है, जो नई जनगणना के बाद ही संभव है। ऐसे में विपक्ष लगातार यह सवाल उठा रहा है कि जब तक नई जनगणना नहीं होती, तब तक इस कानून का क्रियान्वयन व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होगा।
महिला आरक्षण का मुद्दा देश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। अब जबकि इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच इस पर बहस और तेज होने की संभावना है।



