चौ० अजित-जंयत ने बदली सीट, मुजफ्फरनगर,बागपत से आजमायेंगे हाथ

 

अपडेटेड : 03 Feb 2019

लखनऊ। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजय रथ रोकने के लिए यूपी में विपक्षी दलों के गठबंधन में शामिल होने के लिए राष्टीय  लोकदल का संघर्ष जारी है। इस गठबंधन में शामिल सपा- बसपा ने रालोद को फिलहाल तीन सीटें देने पर सहमति जायी है। वहीं रालोद चौथी सीट हाथरस के लिए लगातार दबाव बना रहा है। वहीं छह बार सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री रह चुके चौधरी अजित सिंह ने परम्परागत बागपत और जयंत चौधरी ने मथुरा सीट छोड दी है। साथ ही पार्टी ने मुजफ्फरनगर और हाथरस में भी तैयारियों तेज कर दी है। इसका खुलासा भी जल्द होने की उम्मीद जतायी जा रही है। 
सनद रहे कि गत लोकसभा चुनाव में भाजपा की आंधी के कारण यूपी के सभी विपक्षी दलों तगड़ा झटका लगा। इसे लेकर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलो का गठबंधन बनाने की कवायद आरंभ हो गयी थी। इसका प्रयोग आंकने के लिए हाल में गोरखपुर, फूलपुर एवं कैराना संसदीय क्षेत्र के उप चुनाव में विपक्षी दलों की एकजुटता से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इस परिणाम से उत्साहित यूपी के प्रमुख विपक्षी दल सपा- बसपा ने पुराने  मतभेंदों को भुलाकर गठबंधन कर लिया। इस गठबंधन से कांग्रेस को बाहर कर दिया गया। लेकिन गांधी परिवार की रायबरेली एवं अमेठी पराम्परागत दो सीटों पर गठबंधन ने प्रत्याशी न उतारने का ऐलान कर दिया। इस तरह सपा मुखिया अखिलेश यादव एवं बसपा प्रमुख मायावती  ने गत १२ जनवरी को साझा प्रेस कान्फ्रेंस कर प्रदेश की ३८- ३८ सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान किया था। 
वहीं रालोद इस गठबंधन में शामिल होने के लिए अर्से से बेताब था। इसे लेकर रालोद उपाध्यक्ष जयत चौधरी ने सपा एवं बसपा प्रमुख से कई बार मुलाकात की थी। सूत्रों के अनुसार इस गठबंधन में रालोद को शामिल करने की तैयारियां लगभग पूरी हो गयी है। उसे प्रदेश की ८० सीटों में से तीन सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी करने को कहा गया है। यह सीटें हैं मुजफ्फरनगर, मथुरा एवं बागपत। मुजफ्फरनगर से चौधरी अजित सिंह, बागपत से जयंत चौधरी और मथुरा से अभी प्रत्याशी तय नहीं है। लेकिन उम्मीद है कि जयंत की पत्नी चारू यहां से किस्मत आजमा सकती है। अर्से से चौधरी अजित बागपत से चुनाव लड़ते थे किंतु २०१४ में यहां से हार के बाद उन्होंने अपनी सीट बदल दी है। इसी तरह मथुरा से सासंद रह चुके जयंत चौधरी इस हार के बाद अब बागपत से किस्मत आजमाने जा रहे है। 
इस तरह रालोद अपना जनाधार बचाने के लिए महज तीन सीटो पर समझौता करने जा रहा है। जबकि २००९ के लोकसभा चुनाव में रालोद ने भाजपा के साथ सात सीटों पर समझौता किया था। तब उसके पांच सासद जीते  थे। इसी तरह २००४ के लोकसभा चुनाव में रालोद ने सपा के साथ भी गठबधन किया था। २०१४ में रालोद ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। अब उसे गठबंधन में चार सीटें नहीं मिल पा रही है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद का करीब दर्जन भर सीटों पर ठीक ठाक प्रभाव है। रालोद का कोर वोटर जाट यहां पर हार जीत का फैसला करता रहा है। पिछले चुनाव में यह मतदाता भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया। इससे रालोद का खासा नुकसान हुआ। अब वह इस वोट बैंक पर पुन: अपने पाले में लाने के लिए बेचैन है। 
रालोद के राष्ट्रीय सचिव पूर्व विधायक शिव करन सिंह ने बताया कि भाजपा के खिलाफ बने गठबंधन में रालोद शामिल हो गया है। तीन सीटों पर चुनाव की तैयारियां भी आरंभ कर दी गयी है। सपा मुखिया अखिलेश यादव रालोद को तीन सीटें देने पर राजी भी हो गये हैं। हाथरस सीट को लेकर बात चीत चल रही है। उन्होंने कहा कि जल्द ही इसका खलासा कर दिया जायेगा। रही बात गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम की तो इस बारे में भी सभी दलों के प्रमुख नेताओं के बीच लगभग तय हो चुका है। इसका भी ऐलान जल्द हो जायेगा। बहरहाल किसान व मजदूर की समस्याओं को लेकर रालोद संघर्ष कर रहा है यही हमारा चुनावी एंजेडा होगा।       

 

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