दामाद हुए किस्म किस्म के !

 

अपडेटेड : 05 Jun 2019

दामाद हुए किस्म किस्म के !
के. विक्रम राव 
नेहरू-परिवार के जामाता का कीर्तिमान मीडिया की सुर्ख़ियों में हैं| राबर्ट वाड्रा नाम है उस महापुरुष का| भूमाफियागिरी का आरोप उनपर आयद हुआ है| मगर नेहरू-परिवार का इतिहास देखें तो अच्छे दामाद भी दिखते हैं| अर्थात राबर्ट वाड्रा गुणात्मक दृष्टि से भिन्न निकले| कहाँ जवाहरलाल नेहरू दस वर्ष जेल में रहे अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने में| और कहाँ उनके नाती के दामाद जो आर्थिक अपराध में हिरासत के बाहर-भीतर आते जाते रहते हैं|
राजनेताओं की दबंगई तो देखी सुनी जाती रही, मसलन बीवी-बहन-बेटी और बहू। अथवा भाई-भतीजा, बेटा और साला। किन्तु दामाद बस यदाकदा ही दिखता अथवा याद आता है। शायद इसलिए भी कि वह पराये परिवार में रहता है। फिर भी लोकसभा के सत्रहवें आम निर्वाचन में एक दामाद का जोर-शोर से नामी गिरामी हो जाना करामाती है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर हमला बोलना हो तो वह दामाद अत्यंत सुलभ मुद्दा है। भले ही किसी मेनिफेस्टो में उल्लिखित न भी हुआ हो। वह बीवी के सरकारी आवास का वासी है| अतः मान्य तौर पर घरजमाई नही है। फिर भी राष्ट्र की अर्थनीति पर प्रभाव डालता है, खासकर किसानों से भूमि अधिग्रहण वाले मामले में। सृष्टि के वक्त से ही ऐसा हो रहा है। सौरमंडल के नौ ग्रह तो मनुष्य के भाग्य को निर्दिष्ट करते आये हैं। मगर दामाद को दसवाँ ग्रह कहा गया है। “कन्या राशि स्थितो नित्यः, जामाता दशमो ग्रहः।“ ससुराल में उसे पाहुना पुकारा जाता है। हालांकि मछली की भांति यह मेहमान भी तीन दिन बाद गंधाने लगता है। बशर्तें राजयोग की धनी सास की नासिका का रंध्र अवरूद्ध न हो, अर्थात जुकाम न हो।
सम्यक संदर्भ और परम्परा की दृष्टि से राबर्ट वाड्रा से पहले जन्मे नेहरू कटुम्ब के अन्य दामादों का भी उल्लेख हो जाय। मोतीलाल नेहरू की बड़ी बेटी विजयलक्ष्मी ख्यात राष्ट्रनायक थीं। किशोरावस्था में अपने पिता के अंग्रेजी दैनिक इन्डिपेन्डेन्ट के सम्पादक सैय्यद होसैन से प्रेम विवाह करना चाहती थीं। किन्तु मोतीलाल नेहरू की विनती पर पं. मदन मोहन मालवीय तथा महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप किया और सौराष्ट्र के ब्राह्मण बैरिस्टर रंजीत सीताराम पण्डित से पाणिग्रहण कराया गया। रंजीत पंडित अत्यंत सात्विक पुरूष थें और सैय्यद होसैन के प्रणय प्रसंग को जानकर भी मोतीलाल नेहरू का जामाता बनना उन्होंने स्वीकारा। वे स्वाधीनता संघर्ष में कई बार जेल गये और अन्ततः लखनऊ जेल (14 जनवरी 1944) में ही उनका निधन हो गया। पत्रकारिता के इतिहास में नेहरू-परिवार का यह महान दामाद अविस्मरणीय है। बात 3 सितम्बर 1939 के रात की है। नेहरू के दैनिक नेशनल हेरल्ड में फोन आया। उपसंपादक वाई.पी. वर्मा (बाद में नई दिल्ली के इंडियन एक्सप्रैस के समाचार संपादक) ने बात की। फोन करनेवाले थे रंजीत सीताराम पण्डित। कंपा देनेवाली खबर दी कि इंग्लैण्ड ने जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी। खबर आलइण्डिया रेडियो पर सुनी गई थी। ब्रिटिश कानून में रेडियों से समाचार लेना दंडनीय अपराध था। उस दौर में रविवार को अखबार बन्द रहते थे। अर्थात यदि रंजीत पंडित द्वारा दी गई खबर उस रात (शनिवार) न छपती तो अगले अंक मंगलवार (6 सितम्बर 1939) को प्रकाशित होती। भारत में केवल स्टैटस्मन (दिल्ली) में छपी थी। रंजीत पंडित के कारण लखनऊ में भी छपी। सरकार द्वारा सफाई मांगने पर ब्रिटिश स्वामित्व वाले स्टैटस्मन के संपादक ने कहा कि “क्या राष्ट्र को दो दिन बाद युद्ध की खबर देना सही पत्रकारिता होती ?” रंजीत पंण्डित ने कश्मीरी परिवार के दामाद होने के कारण कश्मीरी कवि कल्हण की राजतरंगिणी का संस्कृत से अंग्रेजी अनुवाद किया। लन्दन में शिक्षित बैरिस्टर थे पर गांधीजी के आह्वान पर ब्रिटिश अदालतों का बहिष्कार किया था। लेकिन मालवीय जी के संस्मरणों के अनुसार बीस-वर्षीया विजय लक्ष्मी नेहरू अपने पिता के दैनिक इण्डिपेंडेंट के संपादक सैय्यद होसेन से प्रेम विवाह करना चाहती थीं। पूर्वी बंगाल का यह आकर्षक युवक आक्सफोर्ड में शिक्षित था और इलाहाबाद आने के पूर्व महान सम्पादक बीजी हार्निमन के वाम्बे क्रानिकल में सहसंपादक था। आजादी के बाद होसैन को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मिस्र में भारत का राजदूत नामित किया। काहिरा में ही उनकी मजार है, जहाँ विजयलक्ष्मी पंडित श्रद्धापुष्प अर्पित किया करती थीं। 
नेहरू परिवार के दूसरे दामाद थे राजा गुणोत्तम हठीसिंह| जिन्होंने अहमदाबाद में विशाल जैन मन्दिर बनवाया। उनकी पत्नी कृष्णा जवाहरलाल नेहरू की दूसरी बहन थीं। उन्हीं के कारमाइकेल रोड़वाले बंगले में राजीव गांधी का जन्म हुआ था। अपने साले की समाजवादी अर्थनीति से रूष्ट होकर गुणोत्तम हठीसिंह निजी पूँजी की हिमायती स्वतंत्र पार्टी में शमिल हो गये। इसके संस्थापको में सी. राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, महारानी गायत्री देवी आदि थें।
अगली पीढ़ी के दामाद थे फिरोज गांधी| जिन्हें आज भी राष्ट्र याद रखता है। बलसाड (दक्षिण गुजरात) के व्यापारी जहांगीर घाण्डी के पुत्र फिरोज ने कार्यक्षेत्र बदला और उपनाम भी। वे इलाहाबाद में बस गये तथा घाण्डी से गांधी बन गये। इन्दिरा नेहरू से विवाह के बाद वे नेशनल हेरल्ड और इंडियन एक्सप्रैस से जुडे। वे रायबरेली से प्रथम सांसद (1952) थें। दिल्ली में ससुराल के सरकारी आवास (तीनमूर्ति भवन) में रहने के बजाय सांसद के छोटे आवास में रहें। फिरोज गांधी ने शायद स्पेनी कहावत सुनी थी कि शेर की पूंछ बनने के बजाय मूषक का सिर बनकर रहो। हालांकि पत्नी इन्दिरा राजीव और संजय के साथ पिता के घर ही रहती थी। माँ इन्दिरा गांधी द्वारा अंतर्धार्मिक विवाह के बाद और आगे बढ़कर ज्येष्ठ पुत्र राजीव ने इतालवी ईसाई सोनिया से शादी की।
आज का नामीगिरामी दामाद है राबर्ट वाड्रा जिसने सबसे लोकप्रिय और आकर्षक कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी का वरण किया। एक बार राबर्ट ने दावा किया था कि लोकसभा की 543 निर्वाचन क्षेत्रों से वे कहीं से भी लड़े तो विजयी होंगे। पर प्रियंका ने राबर्ट को राजनीति से परे ही रखा है। फिर भी बेचारे राबर्ट घुन की भाँति अपने ससुरालवाले गेहूँ के साथ चुनाव में पिसते नजर आ रहें हैं। वे केवल दसवीं तक पढे़ है और एक लाख रूपये की पूंजी से कृत्रिम आभूषण निर्यात का व्यापार शुरू कर गत पांच वर्षों में जमीन के क्रयविक्रय से जुडे़ है। उनकी संपत्ति अब खरब रूपये में हैं। 
इस संपूर्ण दामाद पुराण में सर्वाधिक ऐतिहासिक और यादगार प्रकरण रहा सवा सौ साल पूर्व वाला। तब महान अर्थशास्त्री कार्ल हेनरिख मार्क्स ने अपने पत्रकार दामाद को लिखा था, “मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ”। दामाद पाल लाफार्ग जिसने लारा मार्क्स से विवाह किया था पेरिस में क्रान्तिकारी कार्यों में लीन था। उसने अपने ससुर के चिन्तन में मौलिक संशोधन किया था और निखालिस मार्क्सवादी होने की दुंदुभि बजाता था। नाराज ससुर ने इस वैचारिक भटकाव के कारण दामाद से नाता तोड़ लिया था। लिखा था “यदि तुम मार्क्सवादी हो, तो मैं मार्क्सवादी कदापि नही हूँ।“ अतः पाल लाफार्ग से राबर्ट वाड्रा तक के इस क्रम में सवाल यही उठता है कि संबंधों में छूट कितनी जायज सीमा तक हो सकती है। मगर अन्ततः उत्तर कौन देगा ? गौर करें अमरीकी लेखिका गेट्रेड स्टेइन के पेरिस अस्पताल में अन्तिम शब्दों पर। उनहोंने पूछा था: “प्रश्न क्या है ?” इसके पूर्व कि सहेली एलिस टोकास उत्तर देती, स्टेइन ने कहा “सवाल नहीं तो कोई जवाब भी नहीं“ और आँखें मूँद लीं। यही स्थिति आज भी है। सास-ससुर सवाल नहीं पूछेंगे तो दामाद जवाब देंगे नहीं। उस मृत लेखिका की भाँति।

 

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